मधुमक्खीपालन से किसानों की बदल रही है तकदीर


मधुमक्खीपालन से किसानों की बदल रही है तकदीर

हमारी परम्परा और संस्कृति में शहद का खास महत्व है। हमारे प्राचीन ग्रंथ बताते हैं कि शुद्ध शहद, स्वस्थ शरीर के लिए अमृत का काम करता है। अब, यही शहद किसानों की आमदनी का एक अच्छा जरिया साबित हो रहा है। मधुमक्खीपालन की सबसे अच्छी बात यह है कि इसके लिए ना तो किसी विशेष तकनीक की जरूरत पड़ती है, ना अधिक पूंजी की और ना ही किसी इन्फ्रास्ट्रक्चर की। बस आपको चाहिए थोड़ी जानकारी, थोड़ा प्रशिक्षण और अपनी आमदनी बढ़ाने का पक्का इरादा। मधुमक्खीपालक बनकर आप, अपना जीवन फूलों सा महका सकते हैं।

सरकार ने भी ये बात समझी है, यही वजह है कि मधुमक्खीपालन अब एक आकर्षक ग्रामीण - कृषि - बागवानी आधारित व्यवसाय बनकर उभरा है। मधुमक्खीपालन के कई लाभ हैं। मधुमक्खी पालने से शहद तो मिलता ही है, साथ ही, पराग, मोम, विष (वेनम) और रॉयल जैली का भी उत्पादन होता है। इससे गांव के लोगों, पढ़े- लिखे नौजवानों और जंगलों पर निर्भर रहने वाली आबादी को मधुमक्खी उत्पाद जमा करने, उनके प्रसंस्करण और उनकी मार्केटिंग के काम में रोजगार मिलता है। जंगली इलाकों में मधुमक्खीमपालन एक परंपरागत उद्योग है और इन इलाकों में रहने वाली जनजातियां शहद जमा करने की कला में पारगंत होती हैं। अब सरकार, इन लोगों को छत्ते में रहने वाली मधुमक्खियों के वैज्ञानिक प्रबंधन के बारे में बताएगी।  

अब थोड़ी जानकारी शहद और इससे जुड़ी गतिविधियों की। फिलहाल भारत में करीब 2 लाख मधुमक्खीपालक हैं जो लगभग 30 लाख मधुमक्खी  कालोनियों में मधुमक्खी पालन करते हैं। अपने यहां शहद का अनुमानित वार्षिक उत्पादन लगभग 90,000 मिट्रिक टन है। यहां शहद की प्रति व्यक्ति प्रतिवर्ष खपत 10 ग्राम के करीब है क्योंकि हमारे यहां इसे भोजन में शामिल नहीं किया जाता। अन्य‍ देशों में, जहां इसे भोजन माना जाता है, वहां इसकी खपत अच्छी है। उदाहरण के लिए, जर्मनी में प्रति व्यक्ति इसकी खपत लगभग 2000 ग्राम प्रतिवर्ष है। विश्व में औसतन प्रति व्यक्ति खपत प्रतिवर्ष 200 ग्राम से अधिक है जबकि एशिया में जापान में प्रति व्यक्ति शहद की खपत सबसे अधिक 600 ग्राम प्रतिवर्ष से अधिक है। विश्व में शहद का वार्षिक उत्पादन 12 से 15 लाख मीट्रिक टन के बीच है। मुख्य 15 देश हैं जहां विश्व  के कुल शहद उत्पादन का 90 प्रतिशत शहद इकट्ठा होता है। चीन शहद का सबसे बड़ा उत्पादक है। भारत का छठा/सातवाँ स्थान है।

अब थोड़ा पीछे चलते हैं। 20वीं शताब्दी् के मध्य तक मधुमक्खियों को शहद और मोम के उत्पादन के लिए जाना जाता था लेकिन अब यह तथ्य प्रमुखता से सामने आया है कि प्रकृति में उनकी आर्थिक भूमिका भी है। विभिन्न  कृषि और बागवानी फसलों के परागण, उनकी उत्पादकता बढ़ाने और उनकी क्वालिटी में सुधार लाने में उनका खास योगदान है। आपको बता दें कि अपने यहां मधुमक्खियों की विशिष्ट प्रजातियां मौजूद हैं। उन्हें विभिन्न कृषि और बागवानी फसलों की उपज बढ़ाने के लिए परागण में वैज्ञानिक मधुमक्खीपालन के लिए चरणबद्ध तरीके से इस्तेमाल किया जा रहा है। इस क्षेत्र में एपिस मेलिफेरा, इटैलियन मधुमक्खियां देश में अच्छा परिणाम दे रही हैं। 

पिछले तीन - चार दशकों से प्रति एकड़ उपज बढ़ाने के लिए बहुत बड़ी संख्या में कृषि और बागवानी फसलों के परागण के लिए मधुमक्खियों का उपयोग कई विकसित देशों में नियमित पद्धति बन गई है। अमेरिका और यूरोप में कृषि वैज्ञानिकों ने अनुमान लगाया है कि मधुमक्खी परागण के कारण फसल उपज में वृद्धि का मूल्य शहद और मोम के मूल्य से कई गुना अधिक है। कृषि एवं बागवानी की अधिकतर फसलों को परागकर्ताओं की जरूरत होती है जिनमें मधुमक्खियों के परागकर्ता के रूप में प्रयोग से उत्पादकता बढ़ाने में काफी मदद मिलती है। कुछ फसलों में मधुमक्खीा द्वारा पर-परागण से उनकी पैदावार में बहुत अधिक वृद्धि देखी गयी है। सरसों में 159.8 प्रतिशत, सूरजमुखी में 20 से 3400 प्रतिशत, बरसीम में 24 से 33150 प्रतिशत, सेब में 180 से 6950 प्रतिशत, लीची में 10,000 प्रतिशत, सन्तंरा में 471 से 900 प्रतिशत से अधिक, अमरूद में 70 से 140 प्रतिशत से अधिक। दलहनी फसलों जैसे अरहर, आदि में 30 प्रतिशत तक बढ़ोत्तरी देखी गयी है।

“मधुसंदेश” नामक पायलट परियोजना से अनार, सेब और प्याज में उत्पादकता बढ़ाने में सफलता मिली है। परियोजना के नतीजों के मुताबिक पराग वाली फसलों की उत्पादकता में 80 फीसदी तक की वृद्धि हुई है। इससे किसानों की आय दुगुना करने में मदद मिल रही है। मधुमक्खियों के सफल प्रयोग से पुणे जिले के बारामती और आसपास, अनाज और प्याज के किसानों को भारी लाभ हो रहा है। अनार के बाग में मधुमक्खियों के बक्से रखने से फसलों में जहां परागीकरण की प्रक्रिया तेज हुई है, वहीं फूलों में फल लगने लगा है। अनार के फलों की गुणवत्ता, आकार, सुंदरता और उत्पादकता में 42 से 45 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। इस तरह के फसलों के मूल्य भी बाजार में अच्छे मिल रहे हैं। प्याज की खेती में मधुमक्खी के प्रयोग से 74 से 80 प्रतिशत तक उत्पादकता बढ़ी है। कृषि मंत्रालय के अधीन केवीके बारामती और क्रॉप लाइफ इंडिया ने अब इस अभियान को पूरे महाराष्ट्र में चलाने का फैसला किया है।

प्रकृति ने हमें जैव विविधता में समृद्ध बनाया है। हमारे यहां भांति- भांति की वनस्पतियों और जीवों की कोई कमी नहीं है। मधुमक्खी उद्योग के लिए तो यह बहुत ही अच्छा है। समृद्ध वनस्पति वर्ष की अधिकांश अवधि में मधुमक्खियों को मकरंद और पराग दे सकती हैं और मकरंद और पराग कमी की अवधि कम की जा सकती है। शहद और पराग मुख्यत: वन और अन्य वृक्षों, वनस्पतियों से उत्पादित किए जा सकते हैं जो कि कमोबेश जैव उत्पापद हैं।

राष्ट्रीय मधुमक्खी बोर्ड के अनुसार देश में 12 मुख्य फसलें ऐसी हैं जो स्वत: अनुर्वर (self sterile) हैं अर्थात उन्हें कीट परागण की जरूरत पड़ती है। इन फसलों को परागित करने तथा उत्पादकता बढ़ाने के लिए न्यूनतम 2000 लाख मधुमक्खी कोलोनियों की जरूरत है। फिलहाल क्षमता की तुलना में मधुमक्खी कोलोनियों की संख्या बहुत कम है। शहद के उत्पादों की राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मंडियों में काफी मांग है। कहने का अर्थ यह है कि मधुमक्खीपालन उद्योग में विकास की भारी संभावना और अवसर मौजूद हैं - खासकर गांव के लोगों, जनजातियों, सीमांत और छोटे किसानों और भूमिहीन मजदूरों के लिए।

किसानों की आय बढ़ाने और कृषि और बागवानी में मधुमक्खियों के प्रयोग को आगे बढ़ाने के लिए कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय ने अनेक कदम उठाए हैं। इसने नेशनल बी बोर्ड (एनबीबी) का पुनर्गठन किया है, साथ ही समन्वित बागवानी विकास मिशन (एमआईडीएच) में मधुमक्खीपालन को एक आवश्यक और महत्वपूर्ण अवयव के रूप में शामिल किया है। एनबीबी देश भर में मधुमक्खीपालन के बारे में जागरुकता पैदा करने के लिए भी लगातार काम कर रहा है। एनबीबी का मुख्य उद्देश्य न्यूक्लियस स्टॉक उत्पादन, क्षमता निर्माण, मधुमक्खी प्रजनकों, मधुमक्खी पालकों का प्रशिक्षण, मधुमक्खी‍ उत्पा‍दों का प्रसंस्करण और गुणवत्ता नियंत्रण से संबंधित उत्कृष्ट तकनीक को लोकप्रिय बनाकर भारत में वैज्ञानिक मधुमक्खी पालन का समग्र विकास करना है।

अब मैं, अपने किसान और दूसरे भाइयों से अपील करता हूं वो बिना किसी झिझक, मधुमक्खीपालन अपनाएं और अपनी आमदनी बढ़ा कर परिवार की खुशियां बढ़ाएं। कृषि मंत्रालय  इस काम में उनका सहयोग करेगी। इस बारे में ज्यादा जानकारी चाहिए तो आप  www.nbb.gov.in पर लॉग कर सकते हैं।

आखिर में एक मजेदार तथ्य। मधुमक्खियों की कोलोनियों में बंदर और हाथी प्रवेश करने से डरते हैं।

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