कर्मठ किसान, कर्मठ सरकार


कर्मठ किसान, कर्मठ सरकार

आजकल किसान चर्चा में हैं। वह गरीबी, बेरोजगारी, पिछड़ेपन और बदहाली का प्रतीक बन गया है। लेकिन सवाल है कि इसके लिए जिम्मेदार कौन है? 

आप, हम, सब जानते हैं कि अब तक किसान की अनदेखी की गयी। सरकारें आयीं और गयीं लेकिन खेती- किसानी को किसानों के हक में मोड़ने की बात कभी नहीं सोची गयी। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के शासन में गांव और किसानों पर जरूर तवज्जो दिया गया लेकिन अगर उनके कार्यकाल को छोड़ दें तो कृषि और  किसानों को आगे बढ़ाने और कृषि को किसानों के लिए लाभदायक पेशा बनाने के लिए कुछ काम अवश्य किए गये किंतु जितना और जिस दिशा में करना चाहिए था, नहीं किया गया। किसान लगातार कमजोर और दयनीय होता चला गया। 

आज भी किसानों के हितों की बात करने वाले लोग किसानों को कर्ज माफी, ब्याज माफी और मुफ्त बिजली-पानी देने के लोक रंजक और लुभावने आश्वासन देने के अलावा उनकी माली स्थिति में सुधार लाने के लिए कोई ठोस उपाय बताने की जहमत नहीं उठाते। यह स्थिति तब है जब देश की लगभग आधी आबादी अपनी आजीविका के लिए कृषि पर निर्भर करती है और देश की अर्थव्यवस्था काफी हद तक कृषि पर निर्भर है। 

किसानों का हितैषी होने का दम भरने वाले कुछ लोग जब कृषि और किसानों से जुड़े मुददे उठाते हैं तो उनमें जानकारी का अभाव साफ दिखाई देता है। कई बार तो कुछ लोग बिना पूरे तथ्यों और जानकारी के, किसी कर्मकांड की तरह किसानों का मुद्दा उठाते नजर आए। क्या किसानों के प्रति उनकी जिम्मेदारी बस शोर मचाने भर की है?  किसानों को इस हाल तक पहुंचाने वाले लोग क्या उन्हें सिर्फ राजनीतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल करना और झूठे वादे कर उन्हें बहलाना फुसलाना जानते है ?

अब हम अपनी, यानी मोदी सरकार की बात करते हैं। किसान इस देश का अन्नदाता है, वह अगर खुश नहीं है तो देश खुशहाल नहीं रह सकता। हमारी सरकार ने इस बात को समझा और जब से हमारी सरकार बनी है तब से किसानों के हित में नयी – नयी तजबीजें सुझायी जा रही हैं और उन पर पूरी तन्मयता से अमल किया जा रहा है। प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना, सॉयल हेल्थ कार्ड, नीम कोटेड यूरिया, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, राष्ट्रीय कृषि बाजार (ई-नैम) और कृषि शिक्षा में पांचवी डीन कमेटी की सिफारिशों को लागू कर कृषि शिक्षा को रोजगार और युवाओं से जोड़ने आदि की पहल इसके  बढ़िया उदाहरण हैं। 

गांव एवं खेती के विकास के लिए इस वर्ष का बजट इस बात का गवाह है कि हमारी सरकार ने गांव, गरीब और किसान कल्याण को कितनी गंभीरता से लिया है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने बजट का एक बड़ा हिस्सा गांव, गरीब और किसानों के नाम कर दिया है। आप याद कीजिए, इसके पहले, क्या कृषि के लिए आम बजट में इतनी बड़ी राशि का प्रावधान किया गया था? 

कृषि और किसानों के कल्याण की जितनी योजनाएं पहले से चल रही हैं उनमें हमारी सरकार ने पहले की अपेक्षा कई - कई गुना ज्यादा पैसे आवंटित किए हैं। नयी योजनाओं को तो पूरी मजबूती से आगे बढ़ाया ही जा रहा है। वर्षों से लंबित सिंचाई की 99 योजनाओं की पहचान कर उन्हें पूरा किया जा रहा है ताकि किसानों को सूखे से मुक्ति मिले और पानी के लिए किसानों को मानसून पर निर्भर ना रहना पड़े।। 99 में से 23 सिंचाई योजनाएं तो इसी साल पूरी की जा रही हैं। 

सरकार चाहती है किसान गरीबी और निरक्षरता की दलदल से निकले। जब तक किसान निर्धन और निरक्षर रहेगा, उसकी स्थिति नहीं सुधरेगी। यही वजह है कि हम सिर्फ न्यूनतम समर्थन मूल्य के भरोसे नहीं बैठे हैं। हम कृषि कर्मियों के लिए कमाई के दूसरे रास्ते भी लगातार खोल रहे हैं। हमने संयुक्त दंपत्ति समूह, फार्मर प्रोड्यूसर आर्गेनाइजेशंस के गठन की रफ्तार तेज की है।  कृषि की जगह हमने खेती- बाड़ी पर जोर दिया है। खेती के साथ बाड़ी भी। यानी खेती के साथ किसान फल-फूल-सब्जी, पशुपालन, मछली पालन, मुर्गी पालन, बकरी पालन, मधुमक्खी पालन, मेड़ पर पेड़ आदि भी अपनाए। कृषि को रोजगार का जरिया बनाए। किसान स्वावलंबी और शिक्षित बने। 

इस देश के किसानों ने सरकार की नीयत समझ ली है। इस बार खरीफ की बुआई का रकबा पिछले साल के मुकाबले 42 लाख हेक्टेयर बढ़ गया है। पिछले दो साल के सूखे के बावजूद अनाज के कुल उत्पादन में किसानों ने कमी नहीं आने दी। आने वाले दिनों में देश के किसानों की कर्मठता के अनेक उदाहरण आपको देखने को मिलेंगे। 

 

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