भारतीय कृषि के सात दशक–एक परिदृश्य


भारतीय कृषि के सात दशक–एक परिदृश्य

रोहिनी बरसै मृग तपै, कुछ कुछ अद्रा जाये
कहै घाघ सुने घाघिनी, स्वान भात नहीं खाये,
शुक्रवार की बादरी रहे शनिचर छाय
कहा घाघ सुन घाघिनी बिन बरसे ना जाये..

जन कवि घाघ की ये लोकोक्तियां ग्रामीण जनजीवन में सदियों से प्रचलित हैं। इन्हीं के सहारे हमारे किसान भाई खेती-किसानी की व्यवस्था को सदियों तक समझते रहे एवं मौसम के आगमन, खेती से जुड़ी जरूरतों, फसल चक्र, उत्पादन आदि की जानकारी प्राप्त करते रहे। लेकिन जैसे-जैसे जनसंख्या बढ़ी, खेती पर दबाव बढ़ा और हमारे किसान भाईयों को खेती के साधनों जैसे उन्नत बीज, खाद, कीटनाशक सिंचाई सुविधाओं  आदि की ज़रूरतें महसूस हुई, स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद, भारत में कृषक समुदाय के लोगों की दशा सुधारने के उद्देश्य से कृषि क्षेत्र में बदलाव लाने के योजनाबद्ध प्रयास शुरू हुए। कृषि में नयी जान फूँकने के इरादे से नीति निर्माताओं ने दोहरी नीति अपनाई। पहली- कृषि के विकास में संस्थागत बाधाओं को दूर करने के लिये भूमि सुधारों को लागू करना तथा दूसरा सिंचाई, बिजली और ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी ढाँचे के विकास में बड़े पैमाने पर पूँजी निवेश को बढ़ावा देना। 

विभाजन का दंश झेल रहा स्वतंत्र भारत जहाँ एक तरफ अनेक आर्थिक समस्याओं जैसे- बंगाल अकाल के पश्चात के प्रभाव, निम्न कृषि उत्पादकता, अत्यंत निम्न प्रति व्यक्ति खाद्य उपलब्धता, ग्रामीण ऋणग्रस्तता और बढ़ती हुई भूहीन श्रमिकों की संख्या, से जूझ रहा था, वहीँ बिगडती राजनैतिक एवं सामाजिक परिस्थितियों के कारण व रोजगार अवसरों की अत्यंत कमी के चलते, तीव्र औद्योगिकरण आवश्यक था। इसके अतिरिक्त कृषि की उद्योगों के प्रति सकारात्मक प्रतिक्रिया भी आवश्यक थी। अत: कृषि की स्थिति को सुधारने के लिये शीघ्रतम प्रयास करने  आवश्यक थे। 

नियोजन काल के दौरान भारतीय सरकार ने खाद्य सुरक्षा के लिये प्रयास किए। प्रथम पंचवर्षीय योजना के दौरान 14.9 प्रतिशत कृषि के लिए आवंटित बजट धनराशि इस संदर्भ में अग्रणीय पहल थी। इसके अतिरिक्त सिंचित क्षेत्रों का बढ़ना एवं अन्य भूमि सुधार उपायों के माध्यम से कृषि उत्पादकता में वृद्धि दर्ज हुई। परंतु अनुकूल उत्पादन होने के बाद भी संभावनायें वास्तविकता में रूपांतरित नहीं हुई। साठ के दशक में एक अन्य महत्वपूर्ण नीतिगत प्रयास के तहत कृषि मूल्य नीति भी लागू की गई जो काफी कारगर सिद्ध हुई। इसी दशक के प्रारंभ में नीति निर्धारक ऐसी कृषि तकनीकियों की खोज में थे जो ये रूपांतरण कर सकें और तभी यह तकनीकी ‘‘चमत्कारी बीजों’’ के रूप में सामने आयी, जो कि मैक्सिको में सफल हो चुकी थी। इस प्रकार भारतीय कृषि में हरित क्रांति के आगमन की पृष्ठभूमि तैयार हुई। यह क्रांति एचवाईवी, बीज, रसायन, कीटनाशकों एवं भू-मशीनीकरण पर आधारित थी। इस क्रांति ने भारतीय कृषि की कला को परिवर्तित कर दिया।

60 के दशक के मध्य से 80 के दशक के मध्य तक हरित क्रांति उत्तर पश्चिम राज्यों (पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी यूपी) से लेकर दक्षिण भारतीय राज्यों तक फैल गई। 80 के दशक के प्रारंभ से ही इस तकनीकी का प्रयोग मध्य भारत एवं पूर्वी राज्यों में भी मंदगति से होने लगा। 

यधपि, ज्वार, बाजरा, मक्के विशेषकर चावल एवं गेंहू के एचवाईवी बीजों के प्रयोग ने कृषि उत्पादकता को पर्याप्त तेजी प्रदान की जिससे हरित क्रांति के प्रारंभिक दौर में गेहूँ की उत्पादकता में 75 प्रतिशत की बढ़त दर्ज हुई परंतु भारतीय मानसून अत्यधिक अनिश्चित, अनियमित एवं मौसम आधारित होने के करण एचवाईवी बीजों की अधिक सिंचाई एवं उर्वरकों की मांग को झेल पाने में असमर्थ रही। हरित क्रांति को और प्रभावी बनाने के लिये उच्च क्षमता, विश्वसनीय और कम ऊर्जा उपभोग करने वाले उपकरणों एवं मशीनों की भी आवश्यकता अनुभव हुई जिन्हें सीमित संसाधनों से पूरा किया जाना कठिन था। हरित क्रांति की “जनसंख्या सिद्धांत’’ के आधार पर समीक्षा के अनुसार कृषि उत्पादकता बढ़ी तो  सही परंतु जनसंख्या वृद्धि की दर से कम, जिससे की आत्म पर्याप्तता की स्थिति प्राप्त नहीं की जा सकती थी। 

सिंचाई की विभिन्न तकनीकियों के बाद भी, भारतीय कृषि मानसून पर निर्भर थी। 1979 व 1987 में खराब मानसून के कारण पड़े सूखे ने हरित क्रांति के दीर्घ कालीन उपयोगिता पर प्रश्न चिह्न लगा दिया। एच वाईवी बीजों के सीमित खाद्यान्नों के प्रयोग ने अन्तर खाद्यान्न असंतुलन उत्पन्न किया। भारत के समस्त क्षेत्रों में हरित क्रांति के एक समान प्रयोग व परिणाम न होने के कारण अंतर्क्षेत्रीय असंतुलन भी सामने आये। यद्यपि हरित क्रांति के सफलतम उल्लेखनीय परिणाम पंजाब, हरियाणा व प० उत्तर प्रदेश में प्राप्त हुए परंतु अन्य राज्यों में यह परिणाम संतोषजनक नहीं थे।

मोदी सरकार किसानों के कल्याण में जुटी है। इससे किसानों के जीवन स्तर में बदलाव आ रहा है। प्रधानमंत्री ने 2022 तक किसानों की आमदनी दुगनी करना का लक्ष्य हमें दिया है, हम इस दिशा में काम कर रहे हैं।

हरित क्रांति ने भारतीय कृषि का व्यवसायीकरण कर दिया। कृषि से जुड़े हुए परंपरागत मूल्य एवं संस्कृति विलुप्त हो गए साथ ही हानिकारक उर्वरकों (यूरिया) व कीटनाशकों (डीडीटी, लिन्डेन, सल्फेट इत्यादि) ने पर्यावरण को दूषित कर कृषि श्रमिकों के स्वास्थ्य को प्रभावित किया एवं इसका प्रभाव जैव विविधता (पक्षी व मनुष्य मित्र कीट) पर भी पड़ा।

इसके अतिरिक्त पम्पसेट व ट्यूब वेल के अत्यधिक प्रयोग ने भूमिगत जल के प्राकृतिक संसाधन को भी प्रभावित किया है। भूमिगत जल का स्तर 30-40 फीट से 300-400 फीट तक पहुँच गया।

एचवाईवी बीजों, उर्वरकों व मशीनों की निर्धन कृषकों तक पहुँच न होने के कारण कृषक समुदाय में असमानता बढ़ गई तथा अनेक निर्धन कृषकों में इस कारण ऋणग्रस्तता भी दृष्टिगोचर हुई ।

इन सब प्रभावो को ख़त्म करने के लिए जैविक कृषि, जैविक व पर्यावरण परक तकनीकियों का प्रयोग, जल प्रबंधन, संचयन एवं मृदा गुणवत्ता व नमी को बनाए रखने के प्रयासों को बढ़ावा देना तथा ऐसी विकसित तकनीकों का प्रयोग करना जो न केवल लागत कम करें अपितु प्राकृतिक वातावरण को भी हानि न पहुँचायें, आवश्यक हो गया। साथ ही भारत को पूर्ण खाद्य सुरक्षा व खाद्य आत्मपर्याप्तता प्राप्त करने के लिये कृषि के और अधिक आधुनिकीकरण व विविधिकरण करने की आवश्यकता हुई। भारतीय कृषि में व्यापारिक फसलों के विविधिकरण, वर्षाजल संरक्षण, एग्रो प्रोसेसिंग उद्योगों को प्रोत्साहन, वन संरक्षण, बेकार पड़ी भूमि के प्रयोग व निर्यात संवर्धन के साथ-साथ एक और  “उत्पादकता क्रांति” की आवश्यकता भी महसूस हुई, जिसकी तरफ ठोस कदम बढ़ाना अति आवश्यक हो गया। हरित क्रांति ने हमें यह सीख भी प्रदान की कि तकनीकों के प्रयोग के माध्यम से शीघ्रातिशीघ्र उत्पादकता तो बढ़ायी जा सकती है परंतु इस वृद्धि को दीर्घ काल तक सुनिश्चित करने के लिये उपयुक्त संस्थागत एवं सार्वजनिक नीतियों का क्रियान्वयन अति आवश्यक है। इसके अतिरिक्त भारतीय कृषि की सफलता का अन्य सहायक क्षेत्रों (फूलवानी, बागवानी, मत्स्यपालन, सेरीकल्चर, पशुपालन, दुग्धपालन, मुर्गीपालन, मधुमक्खी पालन इत्यादि) में भी दृष्टिगत होना आवश्यक है। मोदी सरकार किसानों के कल्याण में जुटी है। इससे किसानों के जीवनस्तर मे बदलाव आ रहा है। प्रधानमंत्री ने 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुनी करने का लक्ष्य हमें दिया है, हम इस दिशा में काम कर रहे हैं। 

खाद्य सुरक्षा के दायरे को व्यापक बनाने और समाज के गरीब से गरीब तबके तक अनाज पहुँचाने के उद्देश्य से सन 2000 में अन्त्योदय अन्न योजना प्रारम्भ की गई। इसी दौरान खाद्य सुरक्षा पर मंडराते खतरों को भाँपते हुए पूर्व प्रधान मंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी के कार्यकाल में बहुत से कृषि सम्बन्धी रिफार्म किये गए जिनमें से मॉडल ए.पी.एम.सी. एक्ट, राज्यों को कृषि सुधार की प्रक्रिया से जोड़ने व उन्हें आवश्यकता अनुरूप खर्च करने की छूट के साथ आर. के. वी .वाई. जैसी स्कीमें जिसमे अन- टाइड फण्ड का प्रावधान था, चलाई गईं।  श्री वाजपेयी जी के कार्यकाल में ही  नेशनल कमीशन ऑन फार्मर्स का गठन हुआ जिसके आधार पर बाद में नेशनल पॉलिसी ऑन फार्मर्स का वर्ष 2007 में गठन हुआ। 

भारत जैसे विशाल और आर्थिक विषमताओं वाले देश में दूर-दराज के दुर्गम इलाकों तक और समाज के सबसे कमजोर वर्ग तक अनाज की भौतिक और आर्थिक पहुँच सुनिश्चित करना एक कठिन चुनौती साबित हो रही थी। परन्तु 2014-15 के दौरान मोदी सरकार की अनुकूल नीतियों, कारगर योजनाओं और प्रभावी क्रियान्वयन ने इस कार्य को बखूबी अंजाम दिया। वर्तमान प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में देश में ‘क्लाइमेट स्मार्ट एग्रीकल्चर’ विकसित करने की ठोस पहल की गई है। इसके लिये राष्ट्रीय-स्तर की परियोजना लागू की गई है, जिसके अंतर्गत किसानों को जलवायु अनुकूल कृषि तकनीकें अपनाने के लिये जागरूक एवं सक्षम बनाया जा रहा है। उल्लेखनीय है कि कृषि अनुसंधान एवं विकास के माध्यम से प्रमुख फसलों की जलवायु अनुकूल किस्में विकसित की जा रही हैं, जिनमें प्राकृतिक आपदाओं जैसे सूखा, बाढ़, अत्यधिक गर्मी या सर्दी को सहने की क्षमता मौजूद होती है। इसी प्रकार जलवायु अनुकूल कृषि विधियों का विकास किया गया है। सिंचाई के पानी की कुशलता बढ़ाने के लिये टपक सिंचाई, फव्वारा सिंचाई जैसी सूक्ष्म और कुशल तकनीकें विकसित की गई हैं, जिनका किसानों के खेतों तक प्रसार किया जा रहा है। इस कार्य में तेजी लाने के लिये ‘पर ड्रॉप, मोर क्रॉप’ जैसा राष्ट्रीय कार्यक्रम लागू किया जा रहा है। भूमि की उर्वरता को सतत बनाए रखने के लिये ‘स्वस्थ धरा, खेत हरा’ जैसे कार्यक्रम शुरू किये गये हैं, जिसके अंतर्गत किसानों को बड़े पैमाने पर ‘सॉयल हेल्थ कार्ड’ जारी किये जा रहे हैं। मोदी सरकार की पहलों से फसल बीमा योजना की  निहित कमियों को समाप्तक करते हुए एक नई योजना- ‘’प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना’’  पूरे देश में कार्यान्विहत किए जाने के लिए शुरू की गई है। कृषि के जोखिम को कम करने के लिए कृषि क्षेत्र में यह सबसे बड़ा निवेश है। वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने कृषि क्षेत्र में ‘’सदाबहार क्रांति” पर जोर दिया ताकि कृषि क्षेत्र के सामने आने वाली चुनौतियों का सामना किया जा सके। इसी के तहत गोजातीय नस्लों के विकास और संरक्षण के लिए पहली बार ‘’राष्ट्रीय गोकुल मिशन’’ शुरू किया गया है ताकि सकेंद्रित और वैज्ञानिक ढंग से स्वयदेशी गोजातीय नस्लों  का सरंक्षण और विकास किया जा सके। दूध के उत्पादन में भी देश विश्व  में पहले स्थािन पर बना हुआ है। 2011-14 के मुकाबले 2014-17 में दुग्ध उत्पादन वृद्धि 16.9 प्रतिशत है। 2011-14 में 398 मिलियन टन और 2014-17 में 465.5 मिलियन टन दुग्ध का उत्पादन हुआ। मात्स्यिकी में विकास की अपार संभावनाओं को देखते हुए मोदी सरकार ने मात्स्यिकी क्षेत्र में ‘नीली-क्रांति’ का आह्वान किया है। इस योजना में विशेष रूप से जलकृषि में उन्नत तकनीकी के प्रयोग व  देश में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध जलीय-संसाधनों से मछली-उत्पादन को बढ़ाने पर ध्यान केन्द्रित किया है व अंतर्देशीय व समुद्री मात्स्यिकी को भी शामिल किया है। 2011-14 के मुकाबले 2014-17 में मछली उत्पा दन वृद्धि 20.1 प्रतिशत है। 2011-14 में 272.88 लाख टन था जो कि 2014-17 में बढकर 327.74 लाख टन हो गया है। वर्ष 2017-18 डीप सी फिशिंग को भी नीली क्रान्ति  के अंदर शामिल किया गया है। 8 तटीय राज्यों  के मछुआरों को लाभ मिलेगा व उत्पा7दन में भी वृद्धि होगी। 

हाल ही में 'खाद्य सुरक्षा' के बाद अब 'पोषण सुरक्षा' की अवधारणा को अपनाए जाने पर जोर देते हुए, वैज्ञानिक और प्रौद्योगिकी हस्तक्षेप  पर विशेष बल दिया जा रहा है। साथ ही किसानो को  अपने उत्पादों को बेचने के लिए आनलाईन सुविधा से जोडते हुए देशभर की 585 मंडियों को ई-नाम पोर्टल से जोडना भी प्रस्तावित है ताकि वे अपने उत्पाद को देश में कहीं भी एक बटन दबाकर बेच सकें ओर देश की अन्य मंडियों के मूल्य की जानकारी हासिल कर सकें।  किसानों के मूल्य निर्धारित करने की शक्तियों के बारे में भी सरकार प्रतिबद्ध है जिस के लिए कैशलैस ट्रांजैक्शन पर बल दिया गया है।

आज भारत डिजिटल क्रांति और मोबाईल क्रांति के दौर से गुजर रहा है व मोबाईल की पहुंच गांव-गांव तक है। सूचना प्रोद्योगिकी के इस स्त्रोत को कृषि से जोड़ने की शुरुआत आज की जा चुकी है। सरकार और किसान के बीच दोतरफा संवाद कायम करने में मोबाईल और इंटरनेट की अहम भूमिका के मद्देनज़र  किसानों को सही समय पर सूचना देने के लिए सरकार की कई वेबसाईट, पोर्टल फोन सेवाओं के साथ कृषि एसएमएस की व्यवस्था तथा कई तरह के एप शुरू किए गए हैं। किसान सुविधा एप पर किसानों को घर बैठे कृषि संबंधित सूचनाएं जैसे मौसम, बाजार भाव, फसलों की बीमारियों व कीट की पहचान व उपचार के साथ ही कृषि संबंधित विशेषज्ञ से सलाह की सुविधा मुहय्या करायी जा रही है। मौसमिक आपदाओं व बदलते मौसम परिवेश से  प्रभावित किसानों की फसल बर्बादी के आंकलन को लेकर उहापोह की स्थिति के चलते  भुवन जैसी क्रन्तिकारी ऐप विकसित की गई है जिसके  जरिए ओलावृष्टि से हुई फसल बर्बादी का अनुमान लगाया जा सकता है। किसान अपने घर बैठे किसान कॉल सेंटर में 18001801551 पर नि:शुल्क फोन करके अपनी कृषि समस्या का समाधान पा सकता है। 

वर्तमान क्रांति के चलते, 1.3 अरब की जनसंख्या और विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाले भारत की हाल की संवृद्धि तथा इसका विकास वर्तमान समय की अत्यंत उल्लेखनीय सफलताओं में से है। 

कृषि के इस बदलते परिवेश में नई नीतियों और योजनाओं के साथ साथ वर्तमान सरकार ने वर्ष 2016-17 के बजट में एक और महत्वपूर्ण घोषणा की जिसके तहत भारत की आज़ादी की 75वीं सालगिरह के अवसर पर वर्ष 2022 तक किसानों की आय को दोगुनी करने का  लक्ष्य रखा गया और इस कार्य को करने की एक वृहद योजना की तैयारी हेतू एक समिति भी गठित की गई है ताकि कृषि नीति को ‘उत्पादन केंद्रित’ की जगह ‘आय केंद्रित’ बनाया जा सके। इसकी दो-तीन रिपोर्ट पिछले वर्षों में आई है जिसे लागू भी किया गया है। आधुनिक और सुनहरे भविष्य के लिए हमारा काम, सुशासन, नई खोजों और सुधारों पर आधारित है। हम योजनाओं का लक्ष्य हासिल करने के लिए मिशन मोड में काम कर रहे हैं।

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